परंपरागत नेंग-दस्तूर के संरक्षण और पूर्वजों की स्मृति को सहेजने की अनूठी पहल

■ देवारी परब पर हरू माझी पेनठाना में दीप प्रज्ज्वलित कर की गई सेवा गोंगो सुमरनी

रायगढ़ । छत्तीसगढ़ की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, परंपरा और लोक आस्था को अक्षुण्ण रखने की दिशा में देवारी (दिवारी) परब के अवसर पर इस वर्ष भी परंपरागत नेंग-दस्तूर का निर्वहन किया गया। धानतेरस के पावन अवसर पर खर्राघाट, बुढ़ादरहा केलो पुल के समीप स्थित हरू माझी पेनठाना (देवगुड़ी) में दीप प्रज्ज्वलित कर श्रद्धा एवं परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ सेवा गोंगो सुमरनी की गई।

यह आयोजन प्रतिवर्ष की परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाने की एक सार्थक पहल है। दीप प्रज्ज्वलन के माध्यम से समाज की सांस्कृतिक मान्यताओं, प्रकृति के प्रति सम्मान तथा अपने पुरखों और आराध्य शक्तियों के स्मरण की परंपरा को जीवंत रखा जा रहा है। आयोजन का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों, पारंपरिक आस्था और सामुदायिक विरासत से जोड़ना भी है।

आदिवासी समाज की परंपराओं में देवस्थलों अर्थात पेनठाना और देवगुड़ियों का विशेष महत्व रहा है। ये स्थल सामाजिक आस्था, सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान के केंद्र माने जाते हैं। ऐसे आयोजनों से पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को निरंतरता मिलती है और समाज में अपनी विरासत के प्रति सम्मान की भावना मजबूत होती है।

देवारी परब का सांस्कृतिक महत्व

उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में मनाया जाने वाला देवारी परब केवल दीपोत्सव नहीं, बल्कि कृषि संस्कृति, पशुधन, प्रकृति और आदिवासी लोकपरंपराओं से जुड़ा विशिष्ट पर्व है। विशेषकर गोंड समाज में देवारी की अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है। लोक मान्यताओं में इसे नई फसल, पशुधन के सम्मान और गोंड समाज की पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताओं से जोड़कर देखा जाता है। कुछ गोंडी लोककथाओं में देवारी का संबंध ईशर और गौरा के प्रथम विवाह की मान्यता से भी बताया गया है।

इस परिप्रेक्ष्य में हरू माझी पेनठाना में प्रतिवर्ष दीप प्रज्ज्वलित कर सेवा गोंगो सुमरनी की परंपरा का निर्वहन सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और पुरखों की परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण प्रयास है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *