आम राहगीरों की जान जोखिम में; तमाशबीन बने परिवहन और यातायात विभाग

■ यात्री बसों के आगे ट्रैफिक सिस्टम असहाय ,
शहर की सड़को पर भारी वाहनों का बेतरतीब ठहराव
■ चौक-चौराहों और खतरनाक मोड़ों पर कर्मचारियों को उतारने-चढ़ाने का खेल
रायगढ़ । औद्योगिक नगरी रायगढ़ की सड़कों पर इन दिनों एक अजीब व्यवस्था चल रही है। यहां यातायात नियम आम नागरिकों के लिए तो सख्ती से लागू होते दिखाई देते हैं, लेकिन औद्योगिक संस्थानों की बसों के मामले में मानो नियम-कानून की कोई बाध्यता ही नहीं रह गई है। कर्मचारियों को प्लांट तक पहुंचाने और वापस लाने के नाम पर दौड़ रही बसों के चालक शहर की सड़कों को अपनी जागीर समझकर मनमाने ढंग से वाहन रोक रहे हैं। जहां कर्मचारी खड़े दिखे, वहीं ब्रेक लगा दिया। पीछे से कौन आ रहा है, कितना ट्रैफिक है और अचानक बस रुकने से किसकी जान जोखिम में पड़ सकती है, इससे जैसे किसी को कोई सरोकार नहीं!
चौक-चौराहे हों या अंधे मोड़, हर जगह बसों का मनमाना स्टॉपेज
हैरानी की बात यह है कि कर्मचारियों को चढ़ाने-उतारने के लिए बस स्टाफ की व्यवस्था होने के बावजूद बस चालक निर्धारित स्थानों की मर्यादा तक नहीं निभा रहे। शहर के भीड़भाड़ वाले इलाकों, व्यस्त चौराहों और दुर्घटना की आशंका वाले घुमावदार मोड़ों पर अचानक बसें रोक दी जाती हैं। पीछे चल रहे दोपहिया वाहन चालकों को अचानक ब्रेक लगाना पड़ता है। कई बार वाहन आपस में टकराने की नौबत आ जाती है। सड़क पर जाम लगता है और आम नागरिकों को बेवजह परेशानी झेलनी पड़ती है। सवाल यह है कि क्या कर्मचारियों को समय पर प्लांट पहुंचाने की जल्दबाजी में दूसरे लोगों की जान जोखिम में डालना जायज है?
सड़क पर कब्जा, फिर आपत्ति करने वालों से बदसलूकी!
इस अव्यवस्था में बस चालकों के साथ कुछ कर्मचारियों का रवैया भी परेशानी बढ़ा रहा है। सड़क पर वाहन रोकने अथवा यातायात बाधित करने पर कोई नागरिक आपत्ति जताए तो कई बार चालक बदतमीजी पर उतर आते हैं। कुछ कर्मचारी भी उलटे बहस और विवाद करने लगते हैं। यानी सड़क रोकने की मनमानी भी और सवाल उठाने वालों को आंखें दिखाने का दुस्साहस भी! सार्वजनिक सड़क पर चलने वाले नागरिक आखिर किससे शिकायत करें, जब नियम तोड़ने वालों को रोकने की जिम्मेदारी जिन विभागों की है, वे ही आंखें मूंदे बैठे हों?
समानांतर यातायात व्यवस्था के पीछे कौन ?
परिवहन विभाग बसों के परमिट, फिटनेस और यातायात नियमों के पालन की जिम्मेदारी निभाता है, जबकि शहर की सड़कों पर यातायात नियंत्रण का जिम्मा ट्रैफिक पुलिस के पास है। इसके बावजूद रोजाना होने वाली इस अव्यवस्था पर प्रभावी कार्रवाई का अभाव कई सवाल खड़े करता है। क्या विभागों को यह सब दिखाई नहीं देता? क्या औद्योगिक बसों के निर्धारित पिकअप और ड्रॉप प्वाइंट की जांच होती है? क्या बस चालकों को यातायात नियमों के पालन के लिए कभी जवाबदेह बनाया गया? या फिर औद्योगिक संस्थानों की बसें होने के कारण इनके लिए अलग ही नियम-कायदे चल रहे हैं?
आम जनता को जोखिम में डालने का अधिकार किसने दिया?
रायगढ़ की औद्योगिक पहचान और उद्योगों का रोजगार में योगदान अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं कि औद्योगिक संस्थानों की परिवहन व्यवस्था शहर की सार्वजनिक सड़कों पर मनमानी करने लगे। उद्योग अपने कर्मचारियों के लिए बसें चलाएं, बेहतर सुविधा दें और समयबद्ध परिवहन सुनिश्चित करें, लेकिन इसके लिए निर्धारित सुरक्षित स्टॉपेज बनाना भी उनकी जिम्मेदारी है। सड़क पर अचानक बस रोकना, कर्मचारियों को बीच रास्ते उतारना और पीछे से आ रहे वाहनों को संकट में डालना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता।
अब प्रशासन को केवल औपचारिक चेतावनी जारी करने के बजाय शहर में संचालित औद्योगिक बसों के पिकअप-ड्रॉप प्वाइंट का सर्वे कराना चाहिए। नियम विरुद्ध स्थानों पर बस रोकने वालों पर चालानी कार्रवाई हो, संबंधित उद्योग प्रबंधन से जवाब मांगा जाए और बार-बार उल्लंघन करने वाले बस संचालकों की जवाबदेही तय हो।
आखिर यातायात नियमों का डंडा केवल आम आदमी पर ही क्यों? क्या औद्योगिक बसों के लिए शहर की सड़कें निजी पार्किंग और बस स्टैंड बन चुकी हैं? किसी बड़े हादसे के बाद जांच और कार्रवाई का दिखावा करने से बेहतर है कि प्रशासन समय रहते इस बेलगाम व्यवस्था पर लगाम लगाए।
