चक्रधर समारोह की विरासत – उसकी आत्मा, संगीत-साधना और भविष्य की चिंता


■चक्रधर समारोह : परंपरा की आत्मा और भविष्य बचाने और संरक्षित करने की जरूरत – गणेश कछवाहा
रायगढ़ । संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि तपस्या, साधना और ईश्वर-प्राप्ति का सशक्त माध्यम है। यह ब्रह्मनाद की पवित्र उपासना है।
यही दृष्टि रायगढ़ के ऐतिहासिक गणेश मेला–चक्रधर समारोह की मूल आत्मा रही है। यह केवल कलाकारों के प्रदर्शन का मंच नहीं था, बल्कि भारतीय संगीत, नृत्य, लोककला, साहित्य और रंगकर्म की श्रेष्ठ परंपराओं के सम्मान और उनके जनसरोकार से जुड़ने का एक सांस्कृतिक अभियान था। आज आवश्यकता इस बात की है कि समय के साथ बदलते स्वरूप के बीच इस समारोह की उस मूल आत्मा और गरिमा को सुरक्षित रखा जाए।
चक्रधर समारोह की परिकल्पना कला-साधकों, साहित्यकारों और संस्कृति-कर्मियों की सक्रिय भागीदारी से विकसित हुई। श्री चक्रधर ललित कला केंद्र, उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत अकादमी, भोपाल, संस्कृति विभाग, स्थानीय प्रशासन तथा जनसहयोग से विकसित इस आयोजन का उद्देश्य भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य, लोककला, साहित्य और रंगकर्म को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाना था। इसलिए समारोह को जनसुलभ बनाए रखने के लिए इसकी प्रस्तुतियाँ निःशुल्क रखी गई और कलाकारों के चयन में उनकी कला-साधना तथा प्रस्तुति की गुणवत्ता व श्रेष्ठता को प्रमुख आधार माना जाता था।
उस दौर की एक विशेषता उसका कलात्मक अनुशासन और वातावरण था। माँ सरस्वती की पूजा-अर्चना एवं दीप प्रज्ज्वलन के बाद मंच की पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता था। मंच कलाकार और रसिक दर्शक के बीच किसी औपचारिक दूरी का प्रतीक नहीं, बल्कि कला के प्रति साझा श्रद्धा का स्थल था। प्रस्तुति के दौरान कलाकार और श्रोता के बीच सीधा संवाद होता था—न प्रदर्शन का अनावश्यक आडंबर, न कला के बीच व्यवधान। वहाँ मुख्य आकर्षण स्वयं कला, साधना और रसास्वादन था।
दस दिवसीय समारोह की संरचना भी इसी व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती थी। शास्त्रीय संगीत और नृत्य के साथ लोककलाओं को स्थान मिलता था। लोक कला में अपने माटी की महक होती थी,साहित्य के लिए हिंदी कवि सम्मेलन और उर्दू मुशायरे आयोजित होते थे, जिनका उद्देश्य साहित्यिक परंपरा और हमारी गंगा-जमुनी सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करना था। रंगकर्म के माध्यम से सामाजिक सरोकारों और मानवीय मूल्यों से जुड़े नाटकों को मंच मिलता था।
समारोह की प्रतिष्ठा का एक महत्वपूर्ण कारण कलाकारों के चयन के प्रति बरती जाने वाली गंभीरता भी थी। उपलब्ध विवरणों के अनुसार कलाकारों की कला-साधना, पूर्व प्रस्तुतियों और उनकी विशिष्टता को ध्यान में रखकर आमंत्रण दिए जाते थे। इससे समारोह का मंच धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर के श्रेष्ठ कलाकारों के लिए एक प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंच बनता गया।
इस मंच पर उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ, पंडित बिरजू महाराज, पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, पंडित जसराज, विदुषी गिरिजा देवी, सोनल मानसिंह, शोभना नारायण, पंडित राजन–साजन मिश्र, पंडित छन्नूलाल मिश्र, संतूर के पंडित शिवकुमार शर्मा, परवीन सुल्ताना, तीजन बाई, शारदा सिन्हा जैसे अनेक प्रतिष्ठित कलाकारों तथा साहित्य और रंगकर्म से जुड़े रचनाकारों की सहभागिता ने समारोह की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक बनाया। हिंदी और उर्दू साहित्य के अनेक रचनाकारों तथा रंगकर्मियों ने भी इस परंपरा को समृद्ध किया।
उस समय समारोह में आने वाले रसिकों का उत्साह भी उल्लेखनीय था। आसपास के क्षेत्रों के साथ दूर-दराज से आने वाले अनेक सैकड़ों कला-प्रेमी कई दिनों तक समारोह स्थल पर रुककर कार्यक्रमों का आनंद लेते थे। बैठक व्यवस्था में भी आज के अर्थों वाला विशिष्ट ‘वीआईपी संस्कृति’ प्रमुख नहीं थी। जो पहले आता, वह अपनी जगह बनाता और कला-रसिकता ही सामाजिक पहचान बनती थी। यही कारण था कि समारोह कलाकार और समाज के बीच एक जीवंत सांस्कृतिक सेतु बन सका।
1985 से 2005 तक की यह परंपरा अपने विशिष्ट स्वरूप के साथ आगे बढ़ी। 2006 में आयोजन की व्यवस्था में महत्वपूर्ण संस्थागत परिवर्तन हुआ और समारोह को शासकीय स्तर पर आयोजित करने का निर्णय लिया गया। इस परिवर्तन को केवल प्रशासनिक व्यवस्था का विषय मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। मूल प्रश्न इससे कहीं व्यापक है—क्या किसी सांस्कृतिक समारोह की आत्मा केवल प्रशासनिक व्यवस्था से सुरक्षित रह सकती है, या उसके साथ संस्कृति-साधकों और कला-जगत की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है?
यह प्रश्न किसी व्यक्ति, सरकार या संस्था के विरोध का प्रश्न नहीं है। यह हमारी सांस्कृतिक विरासत के भविष्य का प्रश्न है।
आज आवश्यकता टकराव की नहीं, सहभागिता और पुनर्संयोजन की है। शासन अपनी भूमिका निभाए, संसाधन उपलब्ध कराए और संरक्षण दे; लेकिन कलाकारों, संगीतज्ञों, नृत्याचार्यों, लोककलाकारों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों और संस्कृति-विशेषज्ञों की संस्थागत भागीदारी भी सुनिश्चित हो। कलाकारों के चयन, कार्यक्रमों की गुणवत्ता और सांस्कृतिक दिशा के लिए विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र एवं प्रतिष्ठित समिति बनाई जा सकती है। पारदर्शी मानदंड निर्धारित हों और समारोह की पहचान लोकप्रियता से अधिक कलात्मक उत्कृष्टता से बने।
चक्रधर समारोह को राजनीति से ऊपर उठाने का अर्थ किसी राजनीतिक विचार का विरोध नहीं, बल्कि उसे कला की स्वायत्त गरिमा के अनुकूल बनाना है। मंच पर कला सर्वोपरि हो, कलाकार का सम्मान हो और दर्शक कला का रसास्वादन करने आए—यही किसी प्रतिष्ठित सांस्कृतिक समारोह की वास्तविक सफलता है।
रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान केवल उसकी ऐतिहासिक स्मृतियों में नहीं, बल्कि उसकी जीवंत कला-परंपरा में भी निहित है। राजा चक्रधर सिंह की संगीत और नृत्य के प्रति साधना ने जिस सांस्कृतिक वातावरण को समृद्ध किया, उसी विरासत को आधुनिक समय में आगे बढ़ाने का दायित्व हम सभी का है।
इसलिए समय की मांग है कि चक्रधर समारोह को और अधिक भव्य बनाने से पहले उसे और अधिक सार्थक बनाया जाए। उसकी पहचान बड़े मंच, भीड़ या चमक-दमक से नहीं, बल्कि श्रेष्ठ कला, अनुशासन, साहित्यिक गरिमा, लोक-संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और कलाकार–रसिक के आत्मीय संबंध से हो।
चक्रधर समारोह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर है। इसे किसी एक संस्था, सरकार या पीढ़ी की संपत्ति नहीं, बल्कि समाज की साझा सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखना होगा।
यदि शासन, कला-संस्थाएँ, कलाकार, साहित्यकार, रंगकर्मी, संस्कृति-कर्मी और समाज मिलकर इसकी मूल भावना को पुनः केंद्र में रखते हैं, तो यह समारोह केवल अपने अतीत की प्रतिष्ठा को सुरक्षित नहीं करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भारतीय कला-संस्कृति का एक और अधिक प्रभावशाली राष्ट्रीय मंच बन सकता है।
चक्रधर समारोह की असली शक्ति उसके मंच की भव्यता में नहीं, उस साधना में है जो मंच पर कला को जन्म देती है। उस साधना को बचाना ही चक्रधर समारोह की आत्मा को बचाना है।
– गणेश कछवाहा
संस्थापक सदस्य
गणेश मेला–चक्रधर समारोह
रायगढ़, छत्तीसगढ़

